Sunday, 9 October 2016

GHAZAL_Koyi Kehta Hai Jeene ko...

कोई कहता है जीने को, कोई कहता है मरने को
कोई मह्दूद रहने को कोई हद से गुजरने को

बुलन्दी पर पहुंचने को मैं जब परवाज़ करता हूँ
मेरा अपना ही ले आता है कैंची पर कतरने को

कभी ग़ैरों के दर प: झांक कर मैंने नहीं देखा
मुझे काफी है सीरत ही का एक शीशा सँवरने को

ना जाने क्यूँ ज़रा सी प्यास का इज़हार कर डाला
वो दरया ही उठा लाया मुझे सैराब करने को

जो कुछ आमाल करने हैं वो करले जिन्दगानी में
वहां मोहलत ना मिल पायेगी दोबारा सुधरने को

अब उसकी रहनुमाई में नहीं चलना हमें "तारिक़"
बताता है हमें बारिश जो एक छोटे से झरने को

___रियाज़ तारिक़


Sunday, 24 January 2016

Riyaz Tariq - Mangrol Muqami Mushaira 2015

Riyaz Tariq - Selected Ash'aar


Riyaz Tariq - Selected Ash'aar

मुन्तख़ब अशआर (मांगरोल मुक़ामी मुशायरा)उम्मीद है आप विडियो ज़रूर देखेंगे !(منتخب_اشعار (مانگرول مقامی مشاعرہامید ہے آپ ویڈیوضرور دیکھیں گے

Posted by Riyaz Tariq on Sunday, January 24, 2016

Friday, 15 January 2016

GHAZAL_ Suku'n Hamne Nahi'n...

सुकूं हमने नहीं पाया है अपने आशियाने में
मुकम्मल जि़न्दगी तो बस कटी है आने जाने में

कोई चलकर नहीं जाता मुक़द्दर लेके जाता है
जहां होता है जिसका नाम लिक्खा आबो-दाने में

परिन्दे रोज़ सुबह पेट की ख़ातिर निकलते हैं
नहीं रखते हैं कोई रिज़्क़ पहले से ख़ज़ाने में

यहाँ सूरज, सितारे, चांद कैसे काम करते हैं
किया है ग़ौर भी कुछ इस ख़ुदा के कारख़ाने में

मैं वो तन्हा दिया हूं जल रहा हूं जो के सदियों से
हवा को भी पसीना आ गया मुझको बुझाने में

किसी कमज़ोर को मत देख ऐ ज़ालिम हिक़ारत से
के इक चींटी भी काफी है तेरी मुश्किल बढ़ाने में

सभी कहते हैं अपना पर कोई अपना नहीं रहता
बहुत ही फर्क़ है रिश्ता बनाने और निभाने में

किसी की आंख लग जाए तो समझो प्यार कुछ कम है
गुज़र जाती है आशिक़ की तो शब जगने-जगाने में

उसी का हुक्म है बेशक मगर अफसोस तो यह है
ख़ुदा को ही भुला बैठे हैं हम दौलत कमाने में

कभी मैंने तो यूं ही कह दिया था आज़मा लो तुम
बिता दी उम्र ही उसने तो मुझको आज़माने में

बुढ़ापे में हुवा साबित के मुजरिम ही नहीं था मैं
जवानी तो कटी है बेवजह ही क़ैदख़ाने में

बिना आमाल के छोटा बड़ा कोई नहीं होता
भला पैदा भी हो जाए कोई सय्यद घराने में

अगर दिल से बुलाता तो यक़ीनन आ ही जाता मैं
मगर सच्चाई कुछ न थी तेरे मुझको बुलाने में

पड़ोसी आज भी भूखा था यह तक न ख़्याल आया
बहुत मसरूफ थे हम ईद की ख़ुशियां मनाने में

हुकूमत से कोई ख़तरा है या कुछ और मजबूरी
बहुत डरते हैं शाइर भी क़लम अपना उठाने में

तू मेरा हो नहीं सकता तो मत हो जा ख़ुदा हाफिज़
बहुत से चाहने वाले हैं मेरे इस ज़माने में

शिकायत क्या करें भड़के हुए शोलों से अब ‘तारिक़’
दिये का हाथ भी शामिल है अपना घर जलाने में