कोई कहता है जीने को, कोई कहता है मरने को
कोई मह्दूद रहने को कोई हद से गुजरने को
बुलन्दी पर पहुंचने को मैं जब परवाज़ करता हूँ
मेरा अपना ही ले आता है कैंची पर कतरने को
कभी ग़ैरों के दर प: झांक कर मैंने नहीं देखा
मुझे काफी है सीरत ही का एक शीशा सँवरने को
ना जाने क्यूँ ज़रा सी प्यास का इज़हार कर डाला
वो दरया ही उठा लाया मुझे सैराब करने को
जो कुछ आमाल करने हैं वो करले जिन्दगानी में
वहां मोहलत ना मिल पायेगी दोबारा सुधरने को
अब उसकी रहनुमाई में नहीं चलना हमें "तारिक़"
बताता है हमें बारिश जो एक छोटे से झरने को
___रियाज़ तारिक़
कोई मह्दूद रहने को कोई हद से गुजरने को
बुलन्दी पर पहुंचने को मैं जब परवाज़ करता हूँ
मेरा अपना ही ले आता है कैंची पर कतरने को
कभी ग़ैरों के दर प: झांक कर मैंने नहीं देखा
मुझे काफी है सीरत ही का एक शीशा सँवरने को
ना जाने क्यूँ ज़रा सी प्यास का इज़हार कर डाला
वो दरया ही उठा लाया मुझे सैराब करने को
जो कुछ आमाल करने हैं वो करले जिन्दगानी में
वहां मोहलत ना मिल पायेगी दोबारा सुधरने को
अब उसकी रहनुमाई में नहीं चलना हमें "तारिक़"
बताता है हमें बारिश जो एक छोटे से झरने को
___रियाज़ तारिक़