Tuesday, 16 December 2014

GHAZAL_ Niwala Munh Ka Dene Ke Liye...

निवाला मुंह का देने के लिए जो राह तकते हैं
उन्हीं माँ बाप को बच्चे बड़े होकर झिड़कते हैं
बुझाने के लिए नार-ए-जहन्नुम चंद क़तरे भी
हैं काफी जो निदामत में इन आँखों से टपकते हैं
मेरी आँखों ने देखे हैं शगुफ्ता लोग ऐसे भी
जो हँसते हैं बहुत दिन में मगर शब में सिसकते हैं
मुझे बच्चों हँसते खेलते दिन याद आते हैं
परिंदे सूने आँगन में मेरे जब भी चहकते हैं
लहू का क़तरा क़तरा दे के हमने बाग़बानी की
तभी तो आज इस गुलशन में इतने गुल महकते हैं
मैं तारिक़ हूँ मगर यह बात भी तस्लीम करता हूँ
सितारे और भी ऐसे हैं जो सुबह चमकते हैं

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