सबका हिस्सा हे ऐक ही छत में-
फैसला हो गया अदालत में
ख़ुद होशियार तुम समझते हो-
कुछ नहीं हो मगर हक़ीक़त में
दिल का गौरा है या वोह काला है-
क्या नज़र आ रहा है सूरत में?
खून जलता हे पर करूं तो क्या-
शायरी आ गई है आदत में
मैं तो बुनियाद का वोह पत्थर हूँ-
जो ना आये नज़र इमारत में
जिसने ग़ुस्से पे कर लिया काबू-
है वही शख़्स ऊंचा ताक़त में
शेर "तारिक़" यह सोच कर कहिये-
यह भी शामिल हे एक इबादत में

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